रविवार, 24 मई 2015

गरमी के परकोप


गरमी के परकोप

एसो के गरमी ह थररा डारिस।
अंग अंग म आगी लगा डारिस।।

खेत खार म पसिना
बोहवत हे किसान के बेटा।
लात ताने एसी म
सोवत हे हमर देस के नेता।।

गरमी म हाल बेहाल हे
संगी काला बतावव।
बरसा अऊ जुड़ के
मऊसम ल सोरियावव।।

अब तो बरसा के मऊसम
जल्दी आ जातिस।
तहन गरमी के महा
परकोप ह भाग जातिस।।

हे इंद्र देवता तै सुन
ले मोर पुकार।
गरमी ले बाचे के कर
दे कुछू जुगार।।

एसो के गरमी ह थररा डारिस।
अंग अंग म आगी लगा डारिस।।


रचना - देव हीरा लहरी
चंदखुरी फार्म रायपुर
संपर्क - 09770330338
रचना दिनांक - 24 मई 2015