गुरुवार, 4 जून 2015

।। मै अब्बड रोयेव।।


 ।। मै अब्बड रोयेव।। 

हांथ म टंगिया ल देखेव त अब्बड रोयेव। 
रूख ह घबरा के देखिस त अब्बड रोयेव।। 
पेड़ पउधा ह नई होही त हमर का होही?
डारा के चिरई ल देखेव् त अब्बड रोयेव।।

दम खुटत हे सांस के जिबो त हम कईसे जिबो। 
मनखे ल बिमार पड़त देखेव त अब्बड रोयेव।। 
का जानी का जहर महुरा मिलाथे हमर माटी म। 
हरियर बगीचा मुरझात देखेव् त अब्बड रोयेव।। 

हरा भरा रिहिसे सुग्घर हमर गांव शहर। 
गली मोहल्ला ल देखेव् त अब्बड रोयेव।। 
छत्तीसगढ़ म रूख रई ल काटत हे चुन चुन के। 
मोर गांव के हालात ल देखेव् त अब्बड रोयेव।। 

 ✏  देव लहरी       
चंदखुरी फार्म रायपुर      
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